RBI 15 जून को 75,000 करोड़ रुपये का ओवरनाइट वीआरआर नीलाम करेगा

RBI 15 जून को 75,000 करोड़ रुपये का ओवरनाइट वीआरआर नीलाम करेगा
RBI की वीआरआर नीलामी

भारतीय रिजर्व बैंक चालू और बदलती तरलता स्थितियों की समीक्षा के बाद 15 जून 2026 को ओवरनाइट वेरिएबल रेट रेपो, वीआरआर, नीलामी आयोजित कर रहा है। यह कदम बैंकिंग प्रणाली में अल्पकालिक तरलता प्रबंधन के लिए 75,000 करोड़ रुपये की राशि उपलब्ध कराने पर केंद्रित है।

हाइलाइट्स

  • भारतीय रिजर्व बैंक 15 जून 2026 को लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी के तहत 75,000 करोड़ रुपये की ओवरनाइट वीआरआर नीलामी आयोजित करेगा।
  • नीलामी का समय सुबह 9:30 बजे से 10:00 बजे तक रहेगा, रिवर्सल की तारीख 16 जून 2026 तय की गई है।
  • परिचालन दिशानिर्देश 20 जनवरी 2022 की पुरानी प्रेस विज्ञप्ति के अनुरूप होंगे, जिससे बाजार की परिचित पारदर्शिता और बोली प्रक्रिया कायम रहेगी।

तरलता प्रबंधन के लिए नीलामी योजना

भारतीय रिजर्व बैंक की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह ओवरनाइट वीआरआर नीलामी सोमवार, 15 जून 2026 को लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी, एलएएफ, के तहत आयोजित होगी। नीलामी की अधिसूचित राशि 75,000 करोड़ रुपये है और इसकी अवधि एक दिन की रखी गई है।

नीलामी की समयावधि सुबह 9:30 बजे से 10:00 बजे तक निर्धारित है। इस परिचालन के तहत रिवर्सल की तारीख 16 जून 2026, मंगलवार, तय की गई है।

परिचालन नियम और बाजार महत्व

केंद्रीय बैंक ने कहा है कि इस नीलामी के परिचालन दिशानिर्देश 20 जनवरी 2022 की रिजर्व बैंक प्रेस विज्ञप्ति 2021-2022/1572 में दिए गए नियमों के समान रहेंगे। इससे प्रतिभागियों के लिए प्रक्रिया और बोली ढांचा पहले से परिचित प्रारूप में बना रहता है।

वीआरआर नीलामी का उपयोग आम तौर पर अल्पकालिक तरलता आवश्यकताओं को संतुलित करने के लिए किया जाता है, जिससे बैंकिंग तंत्र में धन उपलब्धता और मनी मार्केट स्थितियों के प्रबंधन में मदद मिलती है। मौजूदा निर्णय यह संकेत देता है कि RBI वर्तमान तरलता परिदृश्य पर निकट नजर रखते हुए अल्पावधि परिचालन साधनों का इस्तेमाल कर रहा है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाने के लिए सरकार और RBI के कदमों पर चर्चा की गई थी, जिनमें एफपीआई के लिए सरकारी बॉन्ड पर कर छूट, Fully Accessible Route का विस्तार और FCNR(B) जमा/फॉरेक्स स्वैप विंडो जैसे विदेशी मुद्रा तरलता बढ़ाने के उपाय शामिल थे। लेख में बताया गया था कि इन कदमों से भुगतान संतुलन और बैंकिंग फंडिंग पर दबाव घट सकता है, हालांकि विश्लेषकों के मुताबिक यह संरचनात्मक पूंजी जरूरतों के मुकाबले आंशिक राहत ही दे सकता है।

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