महिला को-ऑपरेटिव बैंक पर RBI ने नियामकीय उल्लंघन पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया

महिला को-ऑपरेटिव बैंक पर RBI ने नियामकीय उल्लंघन पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया
RBI का 5 लाख जुर्माना

भारतीय रिजर्व बैंक ने बेंगलुरु स्थित महिला को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड पर निदेशकों से जुड़े ऋण नियमों के उल्लंघन के लिए 5 लाख रुपये का मौद्रिक जुर्माना लगाया है। यह कार्रवाई 31 मार्च 2025 की वित्तीय स्थिति के संदर्भ में की गई वैधानिक जांच और उसके बाद सामने आए अनुपालन संबंधी निष्कर्षों के आधार पर की गई है।

हाइलाइट्स

  • RBI ने महिला को-ऑपरेटिव बैंक पर निदेशकों और उनके रिश्तेदारों को ऋण देने संबंधी निर्देशों का उल्लंघन करने पर 5 लाख रुपये का जुर्माना लगाया।
  • यह कार्रवाई RBI की 31 मार्च 2025 तक की वैधानिक जांच और कारण बताओ नोटिस के जवाब के बाद धारा 47A(1)(c), 46(4)(i) और 56 के तहत हुई।
  • RBI ने स्पष्ट किया कि यह जुर्माना केवल नियामकीय अनुपालन का मामला है और इस पर भविष्य में अन्य दंडात्मक कार्रवाई की संभावना बनी रहेगी।

जुर्माने की वजह और नियामकीय आधार

RBI की 11 जून 2026 की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह जुर्माना बैंक द्वारा ‘निदेशकों, उनके रिश्तेदारों और उन फर्मों या संस्थाओं को ऋण और अग्रिम’ संबंधी निर्देशों का पालन नहीं करने पर लगाया गया है। केंद्रीय बैंक ने कहा कि बैंक ने निदेशक-संबंधित ऋण मंजूर किए, जिसके बाद बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 की धारा 47A(1)(c) के साथ धारा 46(4)(i) और 56 के तहत यह कार्रवाई की गई।

RBI ने बैंक की वैधानिक जांच उसके 31 मार्च 2025 तक के वित्तीय स्थिति संदर्भ में की थी। पर्यवेक्षी निष्कर्षों और संबंधित पत्राचार के आधार पर बैंक को कारण बताओ नोटिस जारी किया गया, जिसमें पूछा गया कि निर्देशों का पालन न करने पर उस पर जुर्माना क्यों न लगाया जाए।

नोटिस पर बैंक के जवाब और व्यक्तिगत सुनवाई के दौरान दिए गए मौखिक प्रस्तुतिकरण पर विचार करने के बाद RBI इस निष्कर्ष पर पहुंचा कि बैंक के खिलाफ आरोप कायम है। इसी आधार पर मौद्रिक दंड लगाना उचित माना गया।

बैंकिंग क्षेत्र पर असर और आगे की कार्रवाई

केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया कि यह कार्रवाई नियामकीय अनुपालन में कमियों पर आधारित है और इसका उद्देश्य बैंक तथा उसके ग्राहकों के बीच हुए किसी लेन-देन या समझौते की वैधता पर फैसला देना नहीं है। RBI ने यह भी कहा कि यह जुर्माना भविष्य में शुरू की जा सकने वाली किसी अन्य कार्रवाई पर रोक नहीं लगाता है।

यह कदम सहकारी बैंकिंग क्षेत्र के लिए संकेत देता है कि संबंधित पक्षों को दिए जाने वाले ऋणों पर RBI के निर्देशों का पालन निगरानी का प्रमुख विषय बना हुआ है। ऐसे मामलों में दंडात्मक कार्रवाई का जोखिम केवल वित्तीय लागत तक सीमित नहीं रहता, बल्कि शासन, अनुपालन और आंतरिक नियंत्रण व्यवस्थाओं पर भी दबाव बढ़ाता है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाने के लिए सरकार और आरबीआई के कदमों पर चर्चा की गई थी, जिनमें एफपीआई के लिए सरकारी बॉन्ड पर कर राहत, Fully Accessible Route का विस्तार और FCNR(B) जमा व फॉरेक्स स्वैप जैसे तरलता उपाय शामिल थे। लेख में बताया गया था कि इन कदमों का उद्देश्य रुपये पर दबाव और भुगतान संतुलन की चुनौतियों के बीच बैंकों की फंडिंग स्थिति को सहारा देना है, हालांकि विशेषज्ञों के अनुसार यह समाधान आंशिक रह सकता है।

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