RBI ने भुगतान प्रणाली संचालन प्राधिकरण पर मास्टर निर्देश जारी किए

RBI ने भुगतान प्रणाली संचालन प्राधिकरण पर मास्टर निर्देश जारी किए
RBI के नए निर्देश

भुगतान प्रणाली संचालकों के लिए नियामकीय ढांचे को अधिक स्पष्ट और सुलभ बनाने की दिशा में RBI ने संचालन प्राधिकरण से जुड़े मास्टर निर्देश जारी किए हैं। यह निर्देश तत्काल प्रभाव से लागू होते हैं और कई मौजूदा परिपत्रों व दिशानिर्देशों को एकीकृत करते हैं।

हाइलाइट्स

  • RBI ने Payment and Settlement Systems Act, 2007 के तहत भुगतान प्रणाली संचालन के प्राधिकरण पर मास्टर निर्देश जारी किए, जो तुरंत लागू होंगे।
  • इन निर्देशों में 2015 से 2023 तक के नेट-वर्थ, प्राधिकरण प्रमाणपत्र, निवेश प्रतिबंध और स्वैच्छिक समर्पण से जुड़े कई पुराने दिशानिर्देश समाहित किए गए हैं।
  • RBI का उद्देश्य स्पष्टता बढ़ाना, नियमों की पहुँच आसान बनाना और विनियमित संस्थाओं पर अनुपालन बोझ कम करना है।

समेकित नियामकीय ढांचा तुरंत लागू

RBI की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, केंद्रीय बैंक ने Payment and Settlement Systems Act, 2007 के तहत मिली वैधानिक शक्तियों का उपयोग करते हुए भुगतान प्रणाली संचालन के प्राधिकरण पर मास्टर निर्देश जारी किए हैं। यह नया ढांचा तत्काल प्रभाव से लागू होता है और पहले जारी कई परिपत्रों तथा दिशानिर्देशों को एक ही संदर्भ दस्तावेज में समेटता है।

इन समेकित निर्देशों में 16 जनवरी 2015 के नेट-वर्थ की गणना संबंधी प्रावधान, 12 मई 2016 के स्वैच्छिक रूप से प्राधिकरण प्रमाणपत्र लौटाने के दिशानिर्देश, 15 अक्टूबर 2019 की ऑन-टैप प्राधिकरण व्यवस्था, 4 दिसंबर 2020 की कूलिंग पीरियड व्यवस्था, उसी तारीख के स्थायी वैधता वाले प्राधिकरण प्रमाणपत्र संबंधी प्रावधान, 14 जून 2021 के FATF गैर-अनुपालन अधिकारक्षेत्रों से निवेश संबंधी नियम, और 12 मई 2023 के स्वैच्छिक समर्पण ढांचे को शामिल किया गया है।

अनुपालन बोझ घटाने पर RBI का जोर

केंद्रीय बैंक ने कहा है कि यह समेकन अभ्यास उसके विभिन्न विभागों में चल रही समान प्रक्रिया का हिस्सा है। इसका उद्देश्य स्पष्टता बढ़ाना, नियमों तक पहुंच को आसान बनाना और विनियमित संस्थाओं पर अनुपालन का बोझ कम करना है।

भुगतान क्षेत्र के लिए यह कदम इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एकीकृत निर्देशों से ऑपरेटरों को प्राधिकरण, प्रमाणपत्र वैधता, निवेश प्रतिबंध और स्वैच्छिक समर्पण जैसे विषयों पर बिखरे हुए नियमों के बजाय एक समेकित ढांचा मिलता है। इससे नियामकीय अनुपालन की प्रक्रिया अधिक सुव्यवस्थित होने की संभावना है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में विदेशी पूंजी प्रवाह बढ़ाने के लिए सरकार और आरबीआई के कदमों पर चर्चा की गई थी, जिसमें एफपीआई के लिए सरकारी बॉन्ड निवेश पर कर छूट, Fully Accessible Route का विस्तार और विदेशी मुद्रा तरलता बढ़ाने के उपाय शामिल थे। उस लेख में FCNR(B) जमा और फॉरेक्स स्वैप विंडो जैसे प्रावधानों का उल्लेख करते हुए बताया गया था कि इनसे भुगतान संतुलन और बैंकिंग फंडिंग पर दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है।

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