RBI 17 जून को 50,000 करोड़ रुपये की दूसरी दो-दिवसीय वीआरआर नीलामी आयोजित करेगा

RBI 17 जून को 50,000 करोड़ रुपये की दूसरी दो-दिवसीय वीआरआर नीलामी आयोजित करेगा
RBI की दूसरी वीआरआर नीलामी

भारतीय बैंकिंग प्रणाली में तरलता की बदलती स्थिति के बीच भारतीय रिजर्व बैंक 17 जून 2026 को दूसरी दो-दिवसीय वैरिएबल रेट रेपो, वीआरआर, नीलामी आयोजित कर रहा है। यह कदम लिक्विडिटी एडजस्टमेंट फैसिलिटी, एलएएफ, के तहत 50,000 करोड़ रुपये की अल्पकालिक धनराशि उपलब्ध कराने के लिए उठाया जा रहा है।

हाइलाइट्स

  • RBI 17 जून 2026 को 50,000 करोड़ रुपये की दूसरी दो-दिवसीय वीआरआर नीलामी सुबह 11:00 से 11:30 बजे तक आयोजित करेगा।
  • इस वीआरआर नीलामी की रिवर्सल तारीख 19 जून 2026 तय की गई है, जिससे अल्पकालिक तरलता प्रबंधन लक्षित है।
  • नीलामी संचालन 20 जनवरी 2022 के दिशानिर्देशों के अनुसार होगा, जिससे बाजार सहभागियों के लिए परिचित प्रक्रिया सुनिश्चित होगी।

तरलता प्रबंधन के लिए नीलामी कार्यक्रम

Reserve Bank of India की Reserve Bank of India की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार, यह दूसरी वीआरआर नीलामी बुधवार, 17 जून 2026 को सुबह 11:00 बजे से 11:30 बजे तक आयोजित की जाएगी। नीलामी के तहत अधिसूचित राशि 50,000 करोड़ रुपये है और इसकी अवधि दो दिन तय की गई है।

इस परिचालन के तहत रिवर्सल की तारीख 19 जून 2026, शुक्रवार, रखी गई है। केंद्रीय बैंक ने कहा है कि यह निर्णय मौजूदा और विकसित होती तरलता परिस्थितियों की समीक्षा के बाद लिया गया है।

2022 दिशानिर्देशों के तहत संचालन

केंद्रीय बैंक ने स्पष्ट किया है कि इस नीलामी के परिचालन दिशानिर्देश वही रहेंगे जो 20 जनवरी 2022 की रिजर्व बैंक प्रेस विज्ञप्ति 2021-2022/1572 में दिए गए थे। इससे संकेत मिलता है कि बाजार सहभागियों के लिए प्रक्रिया पहले से स्थापित ढांचे के अनुरूप रहेगी।

यह कदम अल्पकालिक फंडिंग स्थितियों के प्रबंधन में RBI की सक्रिय भूमिका को दर्शाता है और बैंकिंग क्षेत्र को निकट अवधि की तरलता आवश्यकताओं से निपटने में सहारा दे सकता है। प्रेस विज्ञप्ति पर संचार विभाग के उप महाप्रबंधक अजीत प्रसाद का नाम दिया गया है।

हमारी पिछली रिपोर्ट में RBI और सरकार द्वारा विदेशी पूंजी आकर्षित करने तथा बाह्य क्षेत्र को सहारा देने के लिए उठाए गए कदमों पर चर्चा की गई थी, जैसे Fully Accessible Route का विस्तार, सरकारी बॉन्ड पर विदेशी निवेशकों के लिए कर छूट और FCNR(B)/फॉरेक्स स्वैप से जुड़ी पहलें। उसमें यह भी बताया गया था कि इन उपायों से भुगतान संतुलन और बैंकिंग फंडिंग दबाव कुछ हद तक कम हो सकता है, हालांकि विदेशी पोर्टफोलियो बहिर्वाह और रुपये की कमजोरी जैसी चुनौतियां बनी रह सकती हैं।

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